Satyamurthy and P. Krishna Pillai in Hindi – Freedom Fighters of India

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Satyamurthy and P. Krishna Pillai in Hindi - Freedom Fighters of India by Learners Inside.

सुंदर शास्त्री सत्यमूर्ति और पी. कृष्ण पिल्लई – भारत के स्वतंत्रता सेनानी

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Satyamurthy and P. Krishna Pillai in Hindi – Freedom Fighters of India by Learners Inside.

आज हम देश के दक्षिणी भाग के दो महान भारतीयों वीर सत्यमूर्ति और पीo कृष्ण पिल्लई की बात करेंगे।

सत्यमूर्ति – जीवन परिचय

साहस और त्याग की प्रतिमूर्ति सुंदर शास्त्री सत्यमूर्ति का जन्म 19 अगस्त 1887 को हुआ था। उत्कष्ट और प्रभावशाली वक्ता एस सत्यमूर्ति आज के तमिलनाडु की पुदुकोट्टई रियासत में दुरुमय्यम के निवासी थे। उनका जन्म 19 अगस्त 1887 को हुआ था।

उनका लालन पालन पारंपरिक वातावरण में हुआ और मद्रास से शिक्षा सम्पन्न करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक वकालत की लेकिन देश को आजाद कराने की इच्छा उन्हें क्रांति की राह पर दी गई।

उन्होंने औपनिवेशिक शासन के विरोध में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। बंगाल का विभाजन हो या रॉलेट एक्ट, जलियावाला बाग नरसंहार हो या साइमन कमीशन का विरोध, सत्यमूर्ति सबसे आगे नजर आए।

सत्यमूर्ति – मद्रास के महापौर 

जब सत्यमूर्ति 1939 में मद्रास के महापौर बने तो शहर जलसंकट का सामना कर रहा था । दूरदृष्टा राजनेता के रूप में सत्यमूर्ति ने जल आपूर्ति बढाने के लिए शहर के पश्चिम में लगभग पचास किलोमीटर दूर पुण्डी में जलाशय बनाने की आवश्यकता समझी। ये आज भी चेन्नई के लिए एकमात्र जलाशय है।

सत्यमूर्ति लोक कला में निपुण थे। वे कर्नाटक संगीत में तो विशेष रूप से पारंगत थे। उन्होंने मद्रास में संगीत अकादमी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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सत्यमूर्ति – भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन

सत्यमूर्ति ने स्वदेशी आंदोलन और भारत छोडो आंदोलन में भी बढ चढकर भाग लिया और 1942 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया। उन पर मुकदमा चला और अमरावती जेल में सश्रम कारावास की सजा मिली।

इस दौरान उन्हें रीड की हड्डी की बीमारी की समस्या हुई और 28 मार्च 1947 को मद्रास के जनरल अस्पताल में उनका निधन हो गया । सुंदर शास्त्री सत्यमूर्ति वरिष्ठ कांग्रेस नेता के कामराज के राजनीतिक गुरु भी थे।

पी. कृष्ण पिल्लई

आज (19 अगस्त) ही कृष्ण पिल्लई की जयंती और पुण्यतिथि भी है। वे महान स्वाधीनता सेनानी थी। वे वायकाम सत्याग्रह, नमक सत्याग्रह और गुरूवयूर मंदिर आंदोलन से जुडे रहे।

वे केरल में तत्कालीन वाम आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे लेकिन उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत इंडियन नेशनल कांग्रेस से हुई थी। वे पहले गांधीवादी रहे और फिर कांग्रेस सोशलिस्ट बन गए।

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कृष्ण पिल्लई – भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन

कृष्ण पिछले में मंदिर में प्रवेश के लिए वायकाम सत्याग्रह के सक्रिय स्वयंसेवक थे, जिसका नेतृत्व ई. वी. रामासामी कर रहे थे। वायकाम मंदिर प्रवेश आंदोलन अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरोध में चलाया जा रहा था। लंबे समय तक चले उस आंदोलन की सफलता ने सभी हिंदुओं के लिए मंदिर के द्वार खोल दिए।

कृष्ण पिल्लई ने 1930 में कोझिकोड से पय्यानूर तक नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया और सच्चे गांधीवादी के रूप में तिरंगा हाथ में लेकर अंग्रेजों के दमन का बहादुरी से सामना किया।

कृष्ण पिल्लई 1931 में गुरुवयूर मंदिर में घंटी बजाने वाले पहले गैर ब्राह्मण थे। शुरू में उनकी राजनीतिक गतिविधि मुख्य रूप से मालाबार क्षेत्र तक सीमित थी, लेकिन 1936 में उनकी गतिविधियों का विस्तार कोचीन और त्रावणकोर तक हो गया।

1938 में उन्होंने अलपूझा में प्रसिद्ध कामगार हडताल का आयोजन किया जो अत्यधिक सफल रही और 1946 में पुन्नपारा वायला संघर्ष के मुख्य प्रेरणा बनी।

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कृष्ण पिल्लई संगठन कौशल में बहुत निपुण थे जो केरल में दबे कुचले लोगों तक पहुंचने में सफल रहे और मुझे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया ।

18 अगस्त 1948 को सर्पदंश से उनकी असमय मृत्यु हो गई। कृष्ण पिल्लई संभवता केरल के मजदूरों और किसानों के घरों में सबसे लोकप्रिय चेहरों में से एक थे। वे ऐसे नेता थे जिन्हें शोषण और दमन के विरुद्ध साहस और उत्साह से डटे रहने के लिए जाना जाता है।

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जय हिंद जय भारत…!

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